
Ram Prasad Bismil’s Poems:
Ninety-eight years ago on this very day, Ram Prasad Bismil—one of Mother India’s bravest sons and a fearless revolutionary—embraced the gallows with a smile for the freedom of his country. Alongside his revolutionary zeal, Bismil also possessed a deeply poetic soul, leaving behind verses that continue to inspire generations.
Born on June 11, 1897, in Shahjahanpur, Uttar Pradesh, Ram Prasad Bismil was a revolutionary, poet, and patriot of the Indian freedom struggle. From an early age, he displayed an intense sense of nationalism and the courage to challenge injustice and colonial oppression. He was a prominent member of the Hindustan Republican Association (HRA) and played a key role in several revolutionary activities against British rule.
On December 19, 1927, at just 30 years of age, Bismil laid down his life for the nation. Yet, his words lived on.
A sensitive and powerful poet, Ram Prasad Bismil’s writings reflect an extraordinary blend of patriotism, sacrifice, and self-respect. Through immortal lines such as “Sarfaroshi ki Tamanna”, he awakened the revolutionary spirit among India’s youth and infused courage into a nation yearning for freedom.
Even today, his poetry continues to stir hearts and remind us of the price paid for independence. On his death anniversary, here are five of Ram Prasad Bismil’s most impactful poems that continue to ignite the flame of patriotism.
चर्चा अपने क़त्ल का अब दुश्मनों के दिल में है
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देखना है ये तमाशा कौन सी मंजिल में है ?
कौम पर कुर्बान होना सीख लो ऐ हिन्दियो
ज़िन्दगी का राज़े-मुज्मिर खंजरे-क़ातिल में है
साहिले-मक़सूद पर ले चल खुदारा नाखुदा
आज हिन्दुस्तान की कश्ती बड़ी मुश्किल में है
दूर हो अब हिन्द से तारीकि-ए-बुग्जो-हसद
अब यही हसरत यही अरमाँ हमारे दिल में है
बामे-रफअत पर चढ़ा दो देश पर होकर फना
‘बिस्मिल’ अब इतनी हविश बाकी हमारे दिल में है
2. सर फ़िदा करते हैं कुरबान जिगर करते हैं
सर फ़िदा करते हैं कुरबान जिगर करते हैं,
पास जो कुछ है वो माता की नजर करते हैं,
खाना वीरान कहाँ देखिये घर करते हैं!
खुश रहो अहले-वतन! हम तो सफ़र करते हैं,
जा के आबाद करेंगे किसी वीराने को !
नौजवानो ! यही मौका है उठो खुल खेलो,
खिदमते-कौम में जो आये वला सब झेलो,
देश के वास्ते सब अपनी जबानी दे दो,
फिर मिलेंगी न ये माता की दुआएँ ले लो,
देखें कौन आता है ये फ़र्ज़ बजा लाने को ?
ऐ मातृभूमि तेरी जय हो, सदा विजय हो
ऐ मातृभूमि तेरी जय हो, सदा विजय हो
प्रत्येक भक्त तेरा, सुख-शांति-कान्तिमय हो
अज्ञान की निशा में, दुख से भरी दिशा में
संसार के हृदय में तेरी प्रभा उदय हो
तेरा प्रकोप सारे जग का महाप्रलय हो
तेरी प्रसन्नता ही आनन्द का विषय हो
वह भक्ति दे कि ‘बिस्मिल’ सुख में तुझे न भूले
वह शक्ति दे कि दुःख में कायर न यह हृदय हो
3. तराना-ए-बिस्मिल
बला से हमको लटकाए अगर सरकार फांसी से,
लटकते आए अक्सर पैकरे-ईसार फांसी से।
लबे-दम भी न खोली ज़ालिमों ने हथकड़ी मेरी,
तमन्ना थी कि करता मैं लिपटकर प्यार फांसी से।
खुली है मुझको लेने के लिए आग़ोशे आज़ादी,
ख़ुशी है, हो गया महबूब का दीदार फांसी से।
कभी ओ बेख़बर तहरीके़-आज़ादी भी रुकती है?
बढ़ा करती है उसकी तेज़ी-ए-रफ़्तार फांसी से।
यहां तक सरफ़रोशाने-वतन बढ़ जाएंगे क़ातिल,
कि लटकाने पड़ेंगे नित मुझे दो-चार फांसी
5. गुलामी मिटा दो
दुनिया से गुलामी का मैं नाम मिटा दूंगा,
एक बार ज़माने को आज़ाद बना दूंगा।
बेचारे ग़रीबों से नफ़रत है जिन्हें, एक दिन,
मैं उनकी अमरी को मिट्टी में मिला दूंगा।
यह फ़ज़ले-इलाही से आया है ज़माना वह,
दुनिया की दग़ाबाज़ी दुनिया से उठा दूंगा।
ऐ प्यारे ग़रीबो! घबराओ नहीं दिल में,
हक़ तुमको तुम्हारे, मैं दो दिन में दिला दूंगा।
बंदे हैं ख़ुदा के सब, हम सब ही बराबर हैं,
ज़र और मुफ़लिसी का झगड़ा ही मिटा दूंगा।
जो लोग ग़रीबों पर करते हैं सितम नाहक़,
गर दम है मेरा क़ायम, गिन-गिन के सज़ा दूंगा।
हिम्मत को ज़रा बांधो, डरते हो ग़रीबों क्यों?
शैतानी क़िले में अब मैं आग लगा दूंगा।
ऐ ‘सरयू’ यक़ीं रखना, है मेरा सुख़न सच्चा,
कहता हूं, जुबां से जो, अब करके दिखा दूंगा।

